1 अक्टू॰ 2009

13 अप्रैल 2009

शादी की वजह

यह सवाल टेढ़ा है कि लोग शादी क्यो करते है? औरत और मर्द को प्रकृत्या एक-दूसरे की जरूरत होती है लेकिन मौजूदा हालत मे आम तौर पर शादी की यह सच्ची वजह नही होती बल्कि शादी सभ्य जीवन की एक रस्म-सी हो गई है। बहरलहाल, मैने अक्सर शादीशुदा लोगो से इस बारे मे पूछा तो लोगो ने इतनी तरह के जवाब दिए कि मै दंग रह गया। उन जवाबो को पाठको के मनोरंजन के लिए नीचे लिखा जाता है—
एक साहब का तो बयान है कि मेरी शादी बिल्कुल कमसिनी मे हुई और उसकी जिम्मेदारी पूरी तरह मेरे मां-बाप पर है। दूसरे साहब को अपनी खूबसूरती पर बड़ा नाज है। उनका ख्याल है कि उनकी शादी उनके सुन्दर रूप की बदौलत हुई। तीसरे साहब फरमाते है कि मेरे पड़ोस मे एक मुंशी साहब रहते थे जिनके एक ही लड़की थी। मैने सहानूभूतिवश खुद ही बातचीत करके शादी कर ली। एक साहब को अपने उत्तराधिकारी के रूप मे एक लड़के के जरूरत थी। चुनांचे आपने इसी धुन मे शादी कर ली। मगर बदकिस्मती से अब तक उनकी सात लड़कियां हो चुकी है और लड़के का कही पता नही। आप कहते है कि मेरा ख्यालहै कि यह शरारत मेरी बीवी की है जो मुझे इस तरह कुढाना चाहती है। एक साहब पड़े पैसे वाले है और उनको अपनी दौलत खर्च करने का कोई तरीका ही मालूम न था इसलिए उन्होने अपनी शादी कर ली। एक और साहब कहते है कि मेरे आत्मीय और स्वजन हर वक्त मुझे घेरे रहा करते थे इसलिए मैने शादी कर ली। और इसका नतीजा यह हुआ कि अब मुझे शान्ति है। अब मेरे यहां कोई नही आता। एक साहब तमाम उम्र दूसरों की शादी-ब्याह पर व्यवहार और भेंट देते-देते परेशान हो गए तो आपने उनकी वापसी की गरज से आखिरकार खुद अपनी शादी कर ली।
और साहबो से जो मैनेदर्याफ्त किया तो उन्होने निम्नलिखित कारण बतलाये। यह जवाब उन्ही के शब्दों मे नम्बरवार नीचे दर्ज किए जाते है—

१—मेरे ससुर एक दौलत मन्द आदमी थे और उनकी यह इकलौती बेटी थी इसलिए मेरे पिता ने शादी की।
२—मेरे बाप-दादा सभी शादी करते चले आए है इसलिए मुझे भी शादी करनी पड़ी।
३—मैं हमेशा से खामोश और कम बोलने वाला रहा हूं, इनकार न कर सका।
४—मेरे ससुर ने शुरू मे अपने धन-दौलत का बहुत प्रदर्शन किया इसलिए मेरे मां-बाप ने फौरन मेरी शादी मंजूर कर ली।
५—नौकर अच्छे नही मिलते थे ओर अगर मिलते भी थे तो ठहरते नही थे। खास तौर पर खाना पकानेवाला अच्छा नही मिलता। शादी के बाद इस मुसीबत से छुटकारा मिल गय।
६—मै अपना जीवन-बीमा कराना चाहता था और खानापूरी के वास्ते विधवा का नाम लिखना जरूरी था।
७—मेरी शादी जिद मे हुई। मेरे ससुर शादी के लिए रजामन्द न होते थे मगर मेरे पिता को जिद हो गई। इसलिए मेरी शादी हुई। आखिरकार मेरे ससुर को मेरी शादी करनी ही पड़ी।
८—मेरे ससुरालवाले बड़े ऊंचे खानदान के है इसलिए मेरे माता-पिता ने कोशिश करके मेरी शादी की।
९—मेरी शिक्षा की कोई उचित व्यवस्था न थी इसलिए मुझे शादी करनी पड़ी।
१०—मेरे और मेरी बीवी के जनम के पहले ही हम दोनो के मां-बाप शादी की बातचीत पक्की हो गई थी।
११—लोगो के आग्रह से पिता ने शादी कर दी।
१२—नस्ल और खानदान चलाने के लिए शादी की।
१३—मेरी मां को देहान्त हो गया था और कोई घर को देखनेवाला न था इसलिए मजबूरन शादी करनी पड़ी।
१४—मेरी बहने अकेली थी, इस वास्ते शादी कर ली।
१५—मै अकेला था, दफ्तर जाते वक्त मकान मे ताला लगाना पड़ता था इसलिए शादी कर ली।
१६—मेरी मां ने कसम दिलाई थी इसलिए शादी की।
१७—मेरी पहली बीवी की औलाद को परवरिश की जरूरत थी, इसलिए शादी की।
१८—मेरी मां का ख्याल था कि वह जल्द मरने वाली है और मेरी शादी अपने ही सामने कर देना चाहती थी, इसलिए मेरी शादी हो गई। लेकिन शादीको दस साल हो रहे है भगवान की दया से मां के आशीष की छाया अभी तक कायम है।
१९—तलाक देने को जी चाहता था इसलिए शादी की।
२०—मै मरीज रहता हूं और कोई तीमारदार नही है इसलिए मैने शादी कर ली।
२१—केवल संयाग स मेरा विवाह हो गया।
२२—जिस साल मेरी शादी हुई उस साल बहुत बड़ी सहालग थी। सबकी शादी होती थी, मेरी भी हो गई।
२३—बिला शादी के कोई अपना हाल पूछने वाला न था।
२४—मैने शादी नही की है, एक आफत मोल ले ली है।
२५—पैसे वाले चचा की अवज्ञा न कर सका।
२६—मै बुडढा होने लगा था, अगर अब न करता तो कब करता।
२७—लोक हित के ख्याल से शादी की।
२८—पड़ोसी बुरा समझते थे इसलिए निकाह कर लिया।
२९—डाक्टरो ने शादी केलिए मजबूर किया।
३०—मेरी कविताओं को कोई दाद न देता था।
३१—मेरी दांत गिरने लगे थे और बाल सफेद हो गए थे इसलिए शादी कर ली।
३२—फौज मे शादीशुदा लोगों को तनख्वाह ज्यादा मिलतीथी इसलिए मैने भी शादी कर ली।
३३—कोई मेरा गुस्सा बर्दाश्त न करता था इसलिए मैने शादी कर ली।
३४—बीवी से ज्यादा कोई अपना समर्थक नही होता इसलिए मैने शादी कर ली।
३५—मै खुद हैरान हूं कि शादी क्यों की।
३६—शादी भाग्य मे लिखीथी इसलिए कर ली।
इसी तरह जितने मुंह उतनी बातें सुनने मे आयी।
प्रेमचंद
—‘जमाना’ मार्च, १९२७

11 अप्रैल 2009

तुमको कुछ भी ना याद रहा

तुमको कुछ भी ना याद रहा
लम्बी-लम्बी अपनी बातें
जगती सोती छोटी रातें
प्रेम भरी वो कथा कहानी, ना उनमें कुछ स्वाद रहा
तुमको कुछ भी ना याद रहा
नज़रों की वो बोली अपनी
सपनों की वो झोली अपनी
कुछ ना कहकर सबकुछ कहना, अब ना वो उन्माद रहा
तुमको कुछ भी ना याद रहा
प्यार के अपने सारे वादे
कितने सच्चे सीधे-साधे
इस प्रेम के नाते में बस धरती थी, आकाश न था
तुमको कुछ भी ना याद रहा
प्रेम दिया तुमने क्यो इतना
गागर में हो सागर जितना
पहले ही आबाद न था मैं, अब भी यूँ बर्बाद रहा
तुमको कुछ भी ना याद रहा
ना कोई कसम ना कोई वादा
ना वो रिश्ता सीधा सादा
अपना सबकुछ देकर तुमको, मैं भी खाली हाथ रहा
तुमको कुछ भी ना याद रहा

9 अप्रैल 2009

प्रारभद

उसका दामन हाथ से फिसलता रहा, और मैं एक मूक दर्शक बना देखता रहा। वो जा रही थी हमेशा के लिए, मैं चाहकर भी उसे रोक न सका, और रोक कर करता भी क्या? कहता भी क्या? और वो, वो रूकती भी क्यो? जब दोनों ही इस बात से पुरी तरह वाकिफ है कि कोई भविष्य नही है इस रिश्ते का। परन्तु जाते-जाते भी वो कह रही थी कि जिंदगी में सिर्फ़ मुझसे ही प्यार किया है, और भी इस बात से पुरी तरह वाकिफ था कि वो मुझसे प्यार करती है और मैं उस से परन्तु.......... । इस परन्तु ने ही सब ख़त्म कर दिया। मेरी अपनी मजबूरियां है और उसकी अपनी। हाय ! यह मजबूरियां !उसकी आंखों में नमी को मैं देख सकता था, मृगनयनी के नयन जल से पूर्ण थे, बस एक ठोकर कि आवश्यकता थी और वे छलछला जाते, जाने कैसे उसने उन्हें अपनी आंखों में थामें रखा और लगातार बोलती रही। शायद उसकी आंखों कि अथाह गहराई ने ही उस जल को थामने में उसकी मदद कि होगी या ना जाने कितनी बार अभ्यास करते करते वो रोई होगी, शायद इसलिए इस बार उसका प्रयास सफल हो पाया और वो अपनी अश्रुधारा को थामने में पूर्ण रूप से कामयाब रही। शायद वो इतनी बार रोई होगी की अब आंसुओ ने भी आने से इंकार कर दिया होगा। कितनी द्र्रिन रही होगी वो।मैं जानता था की वो आज यही कहने आ रही है, मैं जानता था की अब वो आगे कोई रिश्ता नही रखना चाहती, मैं जानता था की मैं उसके लिए सबकुछ होते हुए भी कुछ नही हूँ और यह भी की हम साथ नही हो सकते। मैं अपनी मनोव्यथा पर इतना स्तब्ध हूँ कि मुझे पता ही नही चला कि वो कब आई और कब चली गई, और मैं मौन खड़ा सब देखता रहा। कुछ बोलना भी चाहा तो शब्दकोष खली हो गया, जैसे कुछ था ही नही कहने को, सब तरफ़ मौन व्याप्त था।जी चाह कि बढ़कर उसे सीने से लगा लूँ और रो दूँ उसे अपनी बाहों में लेकर और कहूँ कि और किसी को शायद ना हो परन्तु मुझे तुम्हारी जरुरत है , मैं अकेला हूँ। मैं ना जाने कैसे इतना भीरु हो गया कि रो भी न सका और कुछ कह भी न सका। सीने में धड़कने तो बढ़ गई पर कुछ कर ना सका, उसे रोक ना सका।जब होश आया तो मैं अकेला खड़ा था, वो जा चुकी थी। सब कुछ शांत था, मैं ही अपनी मनोव्यथा के समुन्द्र में गोते खा रहा था। अपने चारो ओर मैंने एक आकाश सा खालीपन पाया। सब शांत था मैं अकेला आकाश कि ओर दूर कहीं टिमटिमाते हुए तारों को निहार रहा था और सोच रहा था कि हर तारा कितना तनहां है कितना दूर है दूसरे तारे से, क्या कभी किसी एक तारे को दुसरे से प्रेम ना हुआ होगा, क्या कभी उसने अपनी धुरी छोड़कर उस दूसरे तारे कि ओर बढ़ने कि कोशिश ना कि होगी, क्या किसी तारे ने अपनी भीरुता छोड़कर, प्रकृति के नियम को तोड़कर सिर्फ़ प्रेम को ना अपनाया होगा? ओर क्या कभी वो बढ़ ना चला होगा उस सच्चे प्रेम कि ओर जिसे वो अपने ह्रदय कि गहराईयों से चाहता है?परन्तु वासत्विकता हमेशा वैसी नही होती जैसी हम कल्पना करते हैं। प्रकृति अपने नियम नही तोड़ती । वह तारा जिसके भाग्य में दूर से ही अपने प्रेमी को देखने लिखा है तन्हां, अकेला खड़ा अपना रोष लिए अपनी ही आग में जलता रहता है। कितना असह्य महसूस करता होगा वह अपने आप को, शायद यह उसकी भीरुता नही उसका प्रारभद है।
प्रथम प्रणाम