9 अप्रैल 2009
प्रारभद
उसका दामन हाथ से फिसलता रहा, और मैं एक मूक दर्शक बना देखता रहा। वो जा रही थी हमेशा के लिए, मैं चाहकर भी उसे रोक न सका, और रोक कर करता भी क्या? कहता भी क्या? और वो, वो रूकती भी क्यो? जब दोनों ही इस बात से पुरी तरह वाकिफ है कि कोई भविष्य नही है इस रिश्ते का। परन्तु जाते-जाते भी वो कह रही थी कि जिंदगी में सिर्फ़ मुझसे ही प्यार किया है, और भी इस बात से पुरी तरह वाकिफ था कि वो मुझसे प्यार करती है और मैं उस से परन्तु.......... । इस परन्तु ने ही सब ख़त्म कर दिया। मेरी अपनी मजबूरियां है और उसकी अपनी। हाय ! यह मजबूरियां !उसकी आंखों में नमी को मैं देख सकता था, मृगनयनी के नयन जल से पूर्ण थे, बस एक ठोकर कि आवश्यकता थी और वे छलछला जाते, जाने कैसे उसने उन्हें अपनी आंखों में थामें रखा और लगातार बोलती रही। शायद उसकी आंखों कि अथाह गहराई ने ही उस जल को थामने में उसकी मदद कि होगी या ना जाने कितनी बार अभ्यास करते करते वो रोई होगी, शायद इसलिए इस बार उसका प्रयास सफल हो पाया और वो अपनी अश्रुधारा को थामने में पूर्ण रूप से कामयाब रही। शायद वो इतनी बार रोई होगी की अब आंसुओ ने भी आने से इंकार कर दिया होगा। कितनी द्र्रिन रही होगी वो।मैं जानता था की वो आज यही कहने आ रही है, मैं जानता था की अब वो आगे कोई रिश्ता नही रखना चाहती, मैं जानता था की मैं उसके लिए सबकुछ होते हुए भी कुछ नही हूँ और यह भी की हम साथ नही हो सकते। मैं अपनी मनोव्यथा पर इतना स्तब्ध हूँ कि मुझे पता ही नही चला कि वो कब आई और कब चली गई, और मैं मौन खड़ा सब देखता रहा। कुछ बोलना भी चाहा तो शब्दकोष खली हो गया, जैसे कुछ था ही नही कहने को, सब तरफ़ मौन व्याप्त था।जी चाह कि बढ़कर उसे सीने से लगा लूँ और रो दूँ उसे अपनी बाहों में लेकर और कहूँ कि और किसी को शायद ना हो परन्तु मुझे तुम्हारी जरुरत है , मैं अकेला हूँ। मैं ना जाने कैसे इतना भीरु हो गया कि रो भी न सका और कुछ कह भी न सका। सीने में धड़कने तो बढ़ गई पर कुछ कर ना सका, उसे रोक ना सका।जब होश आया तो मैं अकेला खड़ा था, वो जा चुकी थी। सब कुछ शांत था, मैं ही अपनी मनोव्यथा के समुन्द्र में गोते खा रहा था। अपने चारो ओर मैंने एक आकाश सा खालीपन पाया। सब शांत था मैं अकेला आकाश कि ओर दूर कहीं टिमटिमाते हुए तारों को निहार रहा था और सोच रहा था कि हर तारा कितना तनहां है कितना दूर है दूसरे तारे से, क्या कभी किसी एक तारे को दुसरे से प्रेम ना हुआ होगा, क्या कभी उसने अपनी धुरी छोड़कर उस दूसरे तारे कि ओर बढ़ने कि कोशिश ना कि होगी, क्या किसी तारे ने अपनी भीरुता छोड़कर, प्रकृति के नियम को तोड़कर सिर्फ़ प्रेम को ना अपनाया होगा? ओर क्या कभी वो बढ़ ना चला होगा उस सच्चे प्रेम कि ओर जिसे वो अपने ह्रदय कि गहराईयों से चाहता है?परन्तु वासत्विकता हमेशा वैसी नही होती जैसी हम कल्पना करते हैं। प्रकृति अपने नियम नही तोड़ती । वह तारा जिसके भाग्य में दूर से ही अपने प्रेमी को देखने लिखा है तन्हां, अकेला खड़ा अपना रोष लिए अपनी ही आग में जलता रहता है। कितना असह्य महसूस करता होगा वह अपने आप को, शायद यह उसकी भीरुता नही उसका प्रारभद है।
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